नेत्र और पुत्र दाता की देवी मानी जाती है मां नेतुला

जमुई जिले के सिकंदरा प्रखंड के कुमार गांव में स्थित मां नेतुला मंदिर आस्था का केन्द्र है। नेत्र और पुत्र दाता देवी के रूप में मां की ख्याति दूर-दराज तक फैली हुई है। बताया जाता है कि नवरात्र के अवसर पर यहां मेला लगता है। वहीं प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को विशेष पूजन का कार्यक्रम होता है। जिले के श्रद्धालु प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को आकर मां के दरवार में हाजिरी लगाते हैं। वहीं नवरात्र के अवसर पर जमुई के अलावा नवादा, शेखपुरा, नालंदा, लखीसराय, गया और गिरिडिह के अलावा बंगाल के आसनसोल समेत कई जगहों से यहां आकर पुत्र रत्न की प्राप्ति की लिए मन्नतें मांगते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो यह मंदिर गंगा यमुनी की संस्कृति को अपने दामन में समेट रखी है। हिन्दुओं के अलावा मुस्लिम संप्रदाय के लोग भी यहां मां के दरवार में आकर हाजिरी लगाते हैं।

मंदिर की स्थापना का इतिहास

मंदिर कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष हरदेव सिंह, सचिव कृष्णनंद सिंह बताते हैं कि 18वीं शताब्दी में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। कमेटी के सदस्यों का यह भी मानना है कि बड़े बुजूर्ग बताते हैं कि जब से होश संभाले हैं तब से मां का दरवार सज रहा है। लोगों का यह भी कहना है कि 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर जब ज्ञान प्राप्ति के लिए घर छोड़ा था तो पहली रात मां के दरवार में ही वट वृक्ष के नीचे बिताया था। मंगलवार को यहां मंदिर परिसर में बलि भी दी जाती है।

ब्राहांड की संचारिका व चराचर जीवों के जन्मदात्री, पालनकत्री तथा संघारिका जगतजननी मां अंबा के विग्रह स्वरूप दक्ष प्रजापति के पुत्री सती का अग्नि में प्राण त्यागने के बाद आशुतोष भगवान शिव के द्वारा सती के शरीर को लेकर ब्राहांड विधवंस हेतू कंघे पर लेकर भ्रमण किया। भ्रमण के क्रम में चक्र सुर्दशन द्वारा सती शरीर का टुकड़ा कर अलग-अलग करने के क्रम में अंतिम भाग भगवान शिव के शरीर में सटा रहा। पृष्ठ भाग शमशान भूमि बिहार राज्य के जमुई जिला सिंकदारा प्रखंड के कुमार ग्राम में गिरकर स्थापित हुआ। जिसकी तुलना किसी से न की जाए वहीं मां नेतुला के रूप में विराजमान है। मां कब से यहा विराजमान है। इसका वास्तविक उल्लेख नहीं मिलता है।

भगवान महावीर जिनका जन्म आज से 2600 वर्ष पूर्व यहां से करीब 10 किलोमीटर दक्षिण लछुआड़ के जंगल में हुआ है। महावीर पहली बार 11 साल की उम्र में यहां आए और एक रात यहां रूके। इसका प्रमाण जैन धर्मालंबी ग्रंथ कल्पद्रुर्म में है। पुन:  युवावस्था में आए और रहें। उस समय महावीर जिस वट वृक्ष के पास ठहरे थे। वो वट वृक्ष आज भी मौजूद है। ऐसा माना जाता है कि यहां की मां कुमारी है इस कारण से इस गांव का नाम में कुमार पड़ा। मां की महिमा अद्भूत है। नेत्र और पुत्र प्राप्ति के लिए ये पूर्णविख्यात है। इसके कई एक प्रमाण है। मां सिद्धपीठ है।

1954 में गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित शक्तिअंक में इनकी महिमा बताई गई है तथा इन्हें चंद्रघंटा के नाम से भी बताया गया है। यहां की पूजा शारदीय नवरात्र काफी प्रसिद्ध है। यहां प्रतिपदा से विजयादशमी तक मेला रहता है। प्रतिदिन षोड़सो प्रकार से पूजा होती है। 6 अखंडदीप जलते रहता है। मां नेतुला मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों के अलावे तंत्र-मंत्र की भी सिद्धी होती है। मनचाही मुराद पूरी होने के बाद श्रद्धालु सोने या चांदी की आंखें चढ़ाते हैं। संतान प्राप्ति वाले दंपति बकरे की बलि देते है। अष्टमी और नवमी के दिन 12 सौ बकरे की बलि दी जाती है। इस मंदिर में मां नेतुला की मूर्ति के अलावे लक्ष्मी-विष्णु, राम-हनुमान, ऋद्धि-सिद्धि की भी भी पूजा होती हैं। महाअष्टमी के रात्रि में विशेष पूजा होती है और वलिदान की व्यवस्था है। जिसको देखने के लिए बहुत दूर-दूर से लोग हजारों की संख्या में आते है।

 

कैसे पहुंचें मां के दरबार में

जमुई रेलवे स्टेशन से मां नेतुला मंदिर की दूरी 30 किलोमीटर है। वहीं शेखपुरा से 33 किलोमीटर और लखीसराय से भी मंदिर की दूरी 30 किलोमीटर है। मंदिर से नवादा की दूरी 53 किलोमीटर है। जबकि नालंदा की दूरी 60 किलोमीटर है। लखीसराय रेलवे स्टेशन आने के लिए बस मिलता है। सिकंदरा चौक से मंदिर जाने के लिए ऑटो उपलब्ध है। वहीं जमुई से भी सिकंदरा मंदिर जाने के लिए वाहन मिलते हैं। बसों के अलावा छोटी वाहनों से भी मां नेतुला की मंदिर लोग जा सकते हैं।

पंडित राजेंद्र पांडेय, कुमार (जमुई)   

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